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शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
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श्रीभगवानु उवाच
यद्यहं नार्चय़ेय़ं वै ईशानं वरदं शिवम् |  २२   क
आत्मानं नार्चय़ेत्कश्चिदिति मे भावितं मनः |  २२   ख
मय़ा प्रमाणं हि कृतं लोकः समनुवर्तते ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति