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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
ततोऽहं मातलेर्वीर्यमपश्यं परमाद्भुतम् |  १२   क
अश्वांस्तथा वेगवतो यदय़त्नादधारय़त् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति