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शान्ति पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
ये च केचन लोकेऽस्मिन्नर्थाः संशय़कारकाः |  ३५   क
तेषां छेत्ता नास्ति लोके त्वदन्यः पुरुषर्षभ ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति