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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
ततः सम्पीड्यमानास्ते क्रोधाविष्टा महासुराः |  १८   क
अपीडय़न्मां सहिताः शरशूलासिवृष्टिभिः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति