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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
गाण्डीवाद्धि तदा सङ्ख्ये यथा भ्रमरपङ्क्तय़ः |  २२   क
निष्पतन्ति तथा वाणास्तन्मातलिरपूजय़त् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति