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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
तेषामपि तु वाणास्ते वहुत्वाच्छलभा इव |  २३   क
अवाकिरन्मां वलवत्तानहं व्यधमं शरैः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति