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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति स्म शोणितम् |  २६   क
प्रावृषीवातिवृष्टानि शृङ्गाणीव धराभृताम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति