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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
तानहं विविधैर्वाणैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः |  ६   क
गाण्डीवमुक्तैरभ्यघ्नमेकैकं दशभिर्मृधे |  ६   ख
ते कृता विमुखाः सर्वे मत्प्रय़ुक्तैः शिलाशितैः ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति