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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
सङ्घातय़न्तः कौन्तेय़ राजानः पापवुद्धय़ः |  ३२   क
परस्परवधोद्युक्ता मूर्खाः पण्डितमानिनः |  ३२   ख
भविष्यन्ति युगस्यान्ते क्षत्रिय़ा लोककण्टकाः ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति