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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
प्रादुर्भूते ततस्तस्मिन्नस्त्रे नाराय़णे तदा |  १   क
प्रावात्सपृषतो वाय़ुरनभ्रे स्तनय़ित्नुमान् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति