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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
नाशंसन्त जय़ं युद्धे दीनात्मानो धनञ्जय़ |  ११   क
आत्मत्राणे मतिं कृत्वा प्राद्रवन्कुरवो यथा ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति