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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
गजस्कन्धेषु संस्यूता नाराचैश्चलितासनाः |  १४   क
शरार्तैर्विद्रुतैर्नागैर्हृताः केचिद्दिशो दश ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति