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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
पुत्रान्पितॄन्सखीन्भ्रातॄन्समारोप्य दृढक्षतान् |  १७   क
जलेन क्लेदय़न्त्यन्ये विमुच्य कवचान्यपि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति