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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
अवस्थां तादृशीं प्राप्य हते द्रोणे द्रुतं वलम् |  १८   क
पुनरावर्तितं केन यदि जानासि शंस मे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति