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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
हय़ानां हेषतां शव्दः कुञ्जराणां च वृंहताम् |  १९   क
रथनेमिस्वनश्चात्र विमिश्रः श्रूय़ते महान् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति