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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
शिखराणि व्यदीर्यन्त गिरीणां तत्र भारत |  ३   क
अपसव्यं मृगाश्चैव पाण्डुपुत्रान्प्रचक्रिरे ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति