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द्रोण पर्व
अध्याय ७५
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सञ्जय़ उवाच
तत्र केचिन्मिथो राजन्समभाषन्त भूमिपाः |  २४   क
अदृष्टपूर्वं सङ्ग्रामे तद्दृष्ट्वा महदद्भुतम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति