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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
गुरुं मे यत्र पाञ्चाल्यः केशपक्षे परामृशत् |  ३२   क
तन्न जातु क्षमेद्द्रौणिर्जानन्पौरुषमात्मनः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति