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विराट पर्व
अध्याय १०
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वैशम्पाय़न उवाच
स शिक्षय़ामास च गीतवादितं; सुतां विराटस्य धनञ्जय़ः प्रभुः |  १२   क
सखीश्च तस्याः परिचारिकास्तथा; प्रिय़श्च तासां स वभूव पाण्डवः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति