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द्रोण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
एतस्मिन्नन्तरे पार्थः सज्जं कृत्वा महद्धनुः |  १४   क
विशेषय़िष्यन्नाचार्यं सर्वास्त्रविदुषां वरम् |  १४   ख
मुमोच षट्शतान्वाणान्गृहीत्वैकमिव द्रुतम् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति