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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
तमसा चावकीर्यन्त सूर्यश्च कलुषोऽभवत् |  ४   क
सम्पतन्ति च भूतानि क्रव्यादानि प्रहृष्टवत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति