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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
सौहार्दं सर्वभूतेषु यः करोत्यतिमात्रशः |  ४०   क
सोऽद्य केशग्रहं श्रुत्वा पितुर्धक्ष्यति नो रणे ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति