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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
देवदानवगन्धर्वास्त्रस्ता आसन्विशां पते |  ५   क
कथं कथाभवत्तीव्रा दृष्ट्वा तद्व्याकुलं महत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति