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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
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सञ्जय़ उवाच
व्यथिताः सर्वराजानस्तदा ह्यासन्विचेतसः |  ६   क
तद्दृष्ट्वा घोररूपं तु द्रौणेरस्त्रं भय़ावहम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति