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शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
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भीष्म उवाच
तस्यैव च प्रसादेन पुनरेवोत्थितस्तु सः |  ५७   क
महीतलाद्गतः स्थानं व्रह्मणः समनन्तरम् |  ५७   ख
परां गतिमनुप्राप्त इति नैष्ठिकमञ्जसा ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति