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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
वर्जनीय़ाश्च वै नित्यं सक्तवो निशि भारत |  ११४   क
शेषाणि चावदातानि पानीय़ं चैव भोजने ||  ११४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति