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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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व्राह्मण उवाच
तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम् |  १८   क
सुखात्सञ्जाय़ते दुःखमेवमेतत्पुनः पुनः |  १८   ख
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति