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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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व्राह्मण उवाच
न वुद्धिर्धनलाभाय़ न जाड्यमसमृद्धय़े |  २१   क
लोकपर्याय़वृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति