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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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व्राह्मण उवाच
वुद्धिमन्तं च मूढं च शूरं भीरुं जडं कविम् |  २२   क
दुर्वलं वलवन्तं च भागिनं भजते सुखम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति