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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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व्राह्मण उवाच
नित्यप्रमुदिता मूढा दिवि देवगणा इव |  २८   क
अवलेपेन महता परिदृव्धा विचेतसः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति