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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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व्राह्मण उवाच
सुखं वा यदि वा दुःखं द्वेष्यं वा यदि वा प्रिय़म् |  ३०   क
प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदय़ेनापराजितः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति