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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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व्राह्मण उवाच
वुद्धिमन्तं कृतप्रज्ञं शुश्रूषुमनसूय़कम् |  ३२   क
दान्तं जितेन्द्रिय़ं चापि शोको न स्पृशते नरम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति