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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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पिङ्गलो उवाच
एकस्थूणं नवद्वारमपिधास्याम्यगारकम् |  ४९   क
का हि कान्तमिहाय़ान्तमय़ं कान्तेति मंस्यते ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति