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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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पिङ्गलो उवाच
अनर्थोऽपि भवत्यर्थो दैवात्पूर्वकृतेन वा |  ५१   क
सम्वुद्धाहं निराकारा नाहमद्याजितेन्द्रिय़ा ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति