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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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पिङ्गलो उवाच
सुखं निराशः स्वपिति नैराश्यं परमं सुखम् |  ५२   क
आशामनाशां कृत्वा हि सुखं स्वपिति पिङ्गला ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति