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वन पर्व
अध्याय १६८
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अर्जुन उवाच
तमसा संवृते लोके घोरेण परुषेण च |  १४   क
तुरगा विमुखाश्चासन्प्रास्खलच्चापि मातलिः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति