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वन पर्व
अध्याय १६८
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अर्जुन उवाच
सुराणामसुराणां च सङ्ग्रामः सुमहानभूत् |  १७   क
अमृतार्थे पुरा पार्थ स च दृष्टो मय़ानघ ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति