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वन पर्व
अध्याय १६८
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अर्जुन उवाच
तथैव वृत्रस्य वधे सङ्गृहीता हय़ा मय़ा |  १९   क
वैरोचनेर्मय़ा युद्धं दृष्टं चापि सुदारुणम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति