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वन पर्व
अध्याय १६८
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अर्जुन उवाच
अद्यास्त्रमाय़यैतेषां माय़ामेतां सुदारुणाम् |  २४   क
विनिहन्मि तमश्चोग्रं मा भैः सूत स्थिरो भव ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति