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वन पर्व
अध्याय १६८
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अर्जुन उवाच
पुनः प्रकाशमभवत्तमसा ग्रस्यते पुनः |  २७   क
व्रजत्यदर्शनं लोकः पुनरप्सु निमज्जति ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति