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वन पर्व
अध्याय १६८
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अर्जुन उवाच
धाराणां च निपातेन वाय़ोर्विस्फूर्जितेन च |  ६   क
गर्जितेन च दैत्यानां न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति