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आदि पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तर्पितोऽस्मि यथासुखम् |  १७   क
अनुजानामि वां वीरौ चरतं यत्र वाञ्छितम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति