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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
वपन्व्रणे क्षारमिव क्षतानां शत्रुकर्शन |  १५   क
विदीर्यते मे हृदय़ं त्वय़ा वाक्षल्यपीडितम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति