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शान्ति पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः |  ५४   क
यश्च सर्वमय़ो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति