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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
यत्तु धर्मप्रवृत्तस्य हृतं राज्यमधर्मतः |  ९   क
द्रौपदी च परामृष्टा सभामानीय़ शत्रुभिः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति