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आदि पर्व
अध्याय १६९
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वसिष्ठ उवाच
ततो महीतलं तात क्षत्रिय़ेण यदृच्छय़ा |  १७   क
खनताधिगतं वित्तं केनचिद्भृगुवेश्मनि |  १७   ख
तद्वित्तं ददृशुः सर्वे समेताः क्षत्रिय़र्षभाः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति