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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
ईषावन्धं चक्रवन्धं रथवन्धं तथैव च |  १३२   क
प्रणाशय़दमेय़ात्मा धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः ||  १३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति