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सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
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वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या त्वं पार्थ कुशली मत्तमातङ्गगामिनम् |  ११   क
अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां सौभद्रं न स्मरिष्यसि ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति