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अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
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महेश्वर उवाच
नेत्रे मे संवृते देवि त्वय़ा वाल्यादनिन्दिते |  ४३   क
नष्टालोकस्ततो लोकः क्षणेन समपद्यत ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति