शान्ति पर्व  अध्याय ३२७

जनमेजय़ उवाच

एतन्मे संशय़ं विप्र हृदि शल्यमिवार्पितम् |  ११   क
छिन्धीतिहासकथनात्परं कौतूहलं हि मे ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति