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आदि पर्व
अध्याय १०९
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मृग उवाच
नाहं घ्नन्तं मृगान्राजन्विगर्हे आत्मकारणात् |  १८   क
मैथुनं तु प्रतीक्ष्यं मे स्यात्त्वय़ेहानृशंसतः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति