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वन पर्व
अध्याय १६९
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अर्जुन उवाच
हतेष्वसुरसङ्घेषु दारास्तेषां तु सर्वशः |  २१   क
प्राक्रोशन्नगरे तस्मिन्यथा शरदि लक्ष्मणाः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति