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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
नावहास्याः कथं लोके कर्मणानेन संय़ुगे |  २९   क
भवेम सहिताः सर्वे निवर्तध्वं यथावलम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति